Mentha cultivation

 मेंथा की खेती बदायूं, रामपुर, मुरादाबाद, बरेली, पीलीभीत, बाराबंकी, फैजाबाद, अम्बेडकर नगर, लखनऊ आदि जिलों में किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर की जाती है। विगत कुछ वर्षों से मेंथा इन जिलों में जायद की प्रमुख फसल के रूप में अपना स्थान बना रही है। इसके तेल का उपयोग सुगन्ध के लिए व औषधि बनाने में किया जाता है।

भूमि एवं भूमि की तैयारी

मेंथा की खेती क लिए पर्याप्त जीवांश अच्छी जल निकास वाली पी. .एच. मान 6-7.5 वाली बलुई दोमट व मटियारी दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। खेत की अच्छी तरह से जुताई करके भूमि को समतल बना लेते हैं। मेंथा की रोपाई के तुरन्त बाद में खेत में हल्का पानी लगाते हैं जिसके कारण मेन्था की पौध ठीक लग जाये।

संस्तुत प्रजातियाँ

  1. मेन्था स्पाइकाटा एम.एस.एस.-1 (देशी पोदीना)
  2. कोसा (समय व देर से रोपाई हेतु उत्तम) (जापानी पोदीना)
  3. हिमालय गोमती (एम.ए.एच.-9)एम.एस.एस.-1 एच०वाई-77
  4. मेन्था पिप्रेटा-कुकरैल

जड़ों को पौधशाला में लगाने का समय

मेन्था की जड़ों की बुवाई अगस्त माह में नर्सरी में कर देते हैं। नर्सरी को ऊँचे स्थान में बनाते है ताकि इसे जलभराव से रोका जा सके। अधिक वर्षा हो जाने पर जल का निकास करना चाहिए।

बुवाई/रोपाई का समय

समय से मेन्था की जड़ों की बुवाई का उचति समय 15 जनवरी से 15 फरवरी है। देर से बुवाई करने पर तेल की मात्रा कम हो जाती है व कम उपज मिलती है। देर बुवाई हेतु पौधों को नर्सरी में तैयार करके मार्च से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक खेत में पौधों की रोपाई अवश्य कर देना चाहिए। विलम्ब से मेंथा की खेती के लिए कोसी प्रजाति का चुनाव करें।

भूस्तरियो (सकर्स) का शोधन

रोपाई के पूर्व भूस्तरियों को 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति लीटर पानी के घोल बनाकर 5 मिनट तक डुबोकर शोधित करना चाहिए।

बुवाई की विधि

जापानी मेंथा की रोपाई के लिए लाइन की दूरी 30-40 सेमी. देशी पोदीना 45-60 सेमी. तथा जापानी पोदीना में पौधों से पौधों की दूरी 15 सेमी. रखना चाहिए। जड़ों की रोपाई 3 से 5 सेमी. की गहराई पर कूंड़ों में करना चाहिए। रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। बुवाई/रोपाई हेतु 4-5 कुन्तल जड़ों के 8-10 सेमी. के टुकड़े उपयुक्त होते हैं।

उर्वरक की मात्रा

सामान्यतः उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाना लाभदायक होता है। सामान्य परिस्थितियों में मेंथा की अच्छी उपज के लिए 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन 50-60 किग्रा. फास्फोरस 40 किग्रा.पोटाश तथा 20 किग्रा. सल्फर प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए। फास्फोरस, पोटाश तथा सल्फर की पूरी मात्रा तथा 30-35 किग्रा. नाइट्रोजन बुवाई/रोपाई से पूर्व कूंड़ों में प्रयोग करना चाहिए। शेष नाइट्रोजन को बुवाई/रोपाई के लगभग 45 दिन, पर 70-80 दिन पर तथा पहली कटाई के 20 दिन पश्चात् देना चाहिए।

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण

मेंथा में सिंचाई भूमि की किस्म तापमान तथा हवाओं की तीव्रता पर निर्भर करती है। मेंथा में पहली सिंचाई बुवाई/रोपाई के तुरन्त बाद कर देना चाहिए। इसके पश्चात् 20-25 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए व प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई करना आवश्यक है। खरपतवार नियंत्रण रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथलीन 30 ई.सी. के 3.3 लीटर प्रति हे. को 700-800 लीटर पानी में घोलकर बुवाई/रोपाई के पश्चात् ओट आने पर यथाशीघ्र छिड़काव करें।

फसल सुरक्षा

कीट

दीमक

दीमक जड़ों को क्षति पहुंचाती है, फलस्वरूप जमाव पर बुरा असर पड़ता है। बाद में प्रकोप होने पर पौधें सूख जाते है। खड़ी फसल में दीमक का प्रकोप होने पर क्लोरपाइरीफास 2.5 लीटर प्रति हे. की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करें।

बालदार सूंड़ी

यह पत्तियों की निचली सतह पर रहती है और पत्तियों को खाती है। जिससे तेल की प्रतिशत मात्रा कम हो जाती है। इस कीट से फसल की सुरक्षा के लिए डाइकलोर वास 500 मिली. या फेनवेलरेट 750 मिली. प्रति हे. की दर से 600-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। झुन्ड में दिये गये अण्डों एवं प्रारम्भिक अवस्था में झुण्ड में खा रही सूंड़ियों को इक्कठा कर नष्ट कर देना चाहिए। पतंगों को प्रकाश से आकर्षित कर मार देना चाहिए।

पत्ती लपेटक कीट

इसकी सूड़ियां पत्तियों को लपेटते हुए खाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. 1.0 लीटर प्रति हे. की दर से 600-700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

रोग जड़गलन

इस रोग में जड़े काली पड़ जाती है। जड़ों पर गुलाबी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। बुवाई/रोपाई से पूर्व भूस्तारियों का शोधन 0.1% कार्बेन्डाजिम से इस रोग का निदान हो जाता है। इसके अतिरिक्त रोगमुक्त भूस्तारियों का प्रयोग करें।

पर्णदाग

पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इससे पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगती हैं। इस रोग के निदान के लिए मैंकोजेब 75 डब्लू पी नामक फफूंदीनाशक की 2 किग्रा. मात्रा 600-800 लीटर में मिलाकर प्रति हे. की दर से छिड़काव करें।

कटाई

मेंथा फसल की कटाई प्रायः दो बार की जाती है। पहली कटाई के लगभग 100-120 दिन पर जब पौधों में कलियां आने लगे की जाती है। पौधों की कटाई जमीन की सतह से 4-5 सेमी. ऊॅंचाई पर करनी चाहिए। दूसरी कटाई, पहली कटाई के लगभग 70-80 दिन पर करें। कटाई के बाद पौधों को 2-3 घन्टे तक खुली धूप में छोड़ दें तत्पश्चात् कटी फसल को छाया में हल्का सुखाकर जल्दी आसवन विधि द्वारा यंत्र से तेल निकाल लें।

उपज

दो कटाइयों में लगभग 250-300 कुन्तल शाक या 125-150 किग्रा. तेल प्रति हे. प्राप्त होता है।

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